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Must Read: 'जब मैंने भ्रष्ट डॉक्टरों से तंग आकर भारत छोड़ा' - डॉक्टर द्रोण शर्मा मनोचिकित्सक, लंदन

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इसमें कोई शक़ नहीं कि भारत में डॉक्टर इंग्लैंड के डॉक्टरों से कहीं ज़्यादा अमीर हैं. उनके पास पैसे की कोई कमी नहीं है.

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90 के दशक में मैंने भारत छोड़ दिया. भारत में काम करने का माहौल कुछ ऐसा था कि मुझे लगा कि मैं वहां काम नहीं कर सकता हूं.
वो 90 के दशक के शुरुआती दिन थे, जब मैंने दिल्ली में अपनी प्रैक्टिस शुरू की थी. उस वक्त दक्षिणी दिल्ली में तीन चार बड़े बड़े क्लीनिक होते थे जिन्हें पॉलीक्लीनिक कहा जाता था. मैंने वहां काम करना शुरू किया.
वहां मुझे कमरा मिलता था जहां मैं अपने मरीज़ देखता था. मैं मेडिकल रिप्रेज़ेंटेटिव्स (एमआर) से नहीं मिलता था क्योंकि मुझे वो व्यापारी लगते थे. एमआर सीधे तौर पर नहीं बोलते थे लेकिन कहते थे, आप हमारा ख़्याल रखिए, हम आपका ख़्याल रखेंगे.
उनमें से एक ने कहा कि मैं आपको धन्यवाद देने आया हूं. जब मैंने उनसे कारण पूछा तो उन्होंने कहा कि आपका रेफ़रल रेट बहुत अच्छा और आपको जो मिल रहा है क्या आप उससे खुश हैं?.

ये बात सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ. उसने मुझे बताया कि मुझे हर महीने के अंत में जो पैसा मिल रहा था, उसका एक बड़ा हिस्सा मरीज़ों के सीटी-स्कैन जैसे जांच के लिए रेफ़रल का कट था.
मैंने उनसे कहा कि मैंने तो कभी किसी मरीज़ को सीटी-स्कैन करवाने को नहीं कहा तो आप मुझे किस बात का कट दे रहे हैं. उसने मुझे बताया कि मेरे भेजे गए बहुत मरीज़ सीटी स्कैन करवाने पहुंचते हैं. बाद में मुझे पता चला कि मुझे बताए बगैर मेरे नाम से लोग मरीज़ों को जांच करवाने भेज रहे थे.
मैं सदमे में था. न मैंने किसी को टेस्ट करवाने को कहा था, न ही मुझे पता था कि उन टेस्ट के क्या नतीजे निकले. जब मैंने साथी डॉक्टरों से बात की तो कट प्रैक्टिस की बात सुनकर किसी को आश्चर्य नहीं हुआ. वो मेरे हैरान पर आश्चर्यचकित थे.
साथी डॉक्टरों ने कहा, ऐसा तो होता है. कुछ लोगों को ये भी लगा कि शायद मैं कम पैसे मिलने से नाराज़ था. मुझे ऐसी किसी नियामक संस्था के बारे में भी नहीं पता था जहां मैं शिकायत कर सकता था.

मुझे लगा कि यहां काम करना बहुत मुश्किल है. उस वक्त भी पैसे का बहुत ज़्यादा ज़ोर था. मैं लोगों की जी हुज़ूरी नहीं कर सकता था. मैं परेशान हो गया था और आखिरकार मैं आयरलैंड चला गया, जहां से बाद में मैंने इंग्लैंड की राह पकड़ी.
मैं भारत जाता रहता हूं. अभी कुछ दिन पहले मैं भारत में ही था.
भारत में डॉक्टरों का मानसिक रोगियों के मरीज़ों के प्रति बर्ताव बहुत बुरा होता है. मरीज़ों को झिड़ककर बोला जाता है. निजता का कोई नाम नहीं है. मेरे सामने डॉक्टर मरीज़ की जांच करते हैं.
अगर आप मेरे क्लीनिक में आएंगे तो आपके वहां बैठने का सवाल ही नहीं पैदा होता, चाहे आप डॉक्टर हैं या नहीं. मुझे मरीज़ से पूछना पड़ेगा कि उनकी क्या इच्छा है. मुझे आपको बैठाने के लिए इजाज़त लेनी पड़ेगी और मरीज़ को बताना पड़ेगा कि मैं आपको क्यों बैठाना चाहता हूं.

भारत में मरीज़ किसी बात पर क्या महसूस करते हैं, इस पर ज़्यादा तवज्जो नहीं दी जाती. अप्वाइंटमेंट बहुत छोटे होते हैं. नोट्स कीपिंग बहुत खराब है. मैंने किसी (डॉक्टर) को लिखते हुए नहीं देखा. एक या दो वाक्य लिखे जाते हैं बस. मरीज़ों के रिकॉर्ड को बहुत खराब तरीके से रखा जाता है.
मरीज़ को डायग्नोसिस बताई नहीं जाती है. दवा देते वक्त ये नहीं बताया जाता कि उसे क्यों दी जा रही है, उससे क्या दुष्प्रभाव हो सकते हैं. मैंने तो डॉक्टरों को ये बताते नहीं सुना.
भारत में कॉंबिनेशन ड्रग्स यानि दो तीन-दवाओं को मिलाकर एक गोली बनाना, उसका इस्तेमाल बहुत ज़्यादा है जिससे मुझे चिंता होती है. ब्रिटेन में ऐसी कोई व्यवस्था ही नहीं है.
मैं यहां (ब्रिटेन में) कांबिनेशन दवा नहीं लिख सकता. भारत में डॉक्टर कांबिनेशन ड्रग्स लिखते हैं. यहां (इंग्लैंड में) ऐसा लिखने की कोई व्यवस्था ही नहीं है क्योंकि इससे मरीज़ का नुकसान है. भारत में ये आम बात है.
मानसिक रोगियों ने मुझे बताया कि स्थिति भयावह है. डॉक्टरों का सारा ध्यान दवाई देकर बीमारी को ठीक करने में होता है जो ग़लत है. मैंने भोपाल, जयपुर, इंदौर का दौरा किया और वहां मैंने देखा कि डॉक्टर मनोचिकित्सा के ढेर सारे उपचार बता रहे हैं.

एक व्यक्ति का इतनी चीज़ों में माहिर होना असंभव है. ये चिंताजनक है. या तो वो बहुत दिमागवाले हैं अगर वो ऐसा कर पर रहे हैं तो ये लोगों को धोखा देने जैसा है जिस पर कोई नियंत्रण नहीं है.
90 के दशक की शुरुआत में मैं आयरलैंड आया था जहां शुरुआती तीन महीने मैंने मुफ़्त में क्लीनिकल असिस्टेंट के तौर पर काम किया. मुझे बेहतरीन लोग मिले. तब से आज तक मुझे एक बार भी अपने ज़मीर के साथ समझौता नहीं करना पड़ा है. उस वक्त वहां आयरलैंड में मात्र 700 भारतीय थे.
मैंने नौकरी के लिए दरख्वास्त की और मुझे नौकरी मिल गई. लोगों ने मेरी बहुत मदद की.
अगर आप इंग्लैंड में मेरे मरीज़ हैं और आप मेरे खिलाफ़ शिकायत करना चाहते हैं तो ये मेरी ज़िम्मेदारी होगी कि मैं आपको बताऊं कि आप मेरे खिलाफ़ कैसे शिकायत कर सकते हैं. उस शिकायत के आधार पर हर साल मेरी समीक्षा होगी. उस पर बहस होगी कि हमने उस घटना से क्या सीख ली?

अगर मुझे कोई यहां घूस देने की कोशिश भी करे तो मैं सीधे केयर क्वालिटी कमीशन (इंग्लैंड में स्वास्थ्य और सामाजिक दायित्व मामलों की नियामक संस्था) के दफ़्तर फ़ोन कर सकता हूं. मैंने सरकारी और निजी दोनों ही क्षेत्रों में काम किया है और अगर मैं कोई काम नहीं करना चाहता हूं तो मैं मना कर सकता हूं और कभी भी उसका प्रतिकूल असर मुझ पर नहीं पड़ा है.
मैं इंदौर में एक दोस्त के साथ मेंटल हेल्थ फ़ेसिलिटी की शुरुआत करने की कोशिश कर रहा हूं, टेली स्काइट्री के माध्यम से. अगर मैं भारत में मनोचिकित्सा अस्पताल खोलने की कोशिश करता हूं तो भारत में डॉक्टर्स बोलते हैं कि ये मेरे बस की बात नहीं है क्योंकि ऐसा करने के लिए दफ़्तरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं, लोगों से पहचान करनी पड़ती है. मसला पहचान पर आकर रुक जाता है.
ज़रूरी है ड्रग कंपनियों और डॉक्टरों के बीच सांठगांठ को खत्म किया जाए, डॉक्टरों पर नियंत्रण कसा जाए, अगर डॉक्टर ग़लत काम करें, उनके लाइसेंस कैंसिल हों और मेडिकल पढ़ाई का स्तर सुधारा जाए.
(ये लेख बीबीसी संवाददाता विनीत खरे से बातचीत पर आधारित है. डॉक्टर द्रोण शर्मा लंदन में प्रैक्टिस करते हैं. उनके अनुभव मनोरोग पीड़ितों के इलाज पर आधारित हैं.)

http://www.bbc.com/hindi/india/2016/07/160704_d...

3 Comments  |  
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ekdum sahi h bro
yaha india me jitne v doctor h wo sab bas apne pocket bhrne ke liye patients ko tang krte h…faltu me commission ke liye 20k ka test likh dete h or illness ka karan btane ke wajah bas goliya khane ke liye bolte h

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Good share !

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Good share ! complete reality !!

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